एक दिन मौसम बहुत अच्छा और सुहाना था, लगता था कि बारिश होगी, पर हो नहीं रही थी। मंद-मंद हवा चल रही थी। बादल आसमान में ऐसे ठहरे थे, जैसे किसी निर्णय पर पहुँचने की कोशिश कर रहे हों।
मैं अपने पुश्तैनी मकान की छत पर खड़ा क्षितिज के उस पार देखने की कोशिश कर रहा था। अपने ही किसी अधूरे से ख्याल में गुम था।
कभी-कभी जीवन में भी ऐसा ही मौसम आता है। न धूप अच्छी लगती है, न बारिश होती है। बस एक इंतज़ार बना रहता है।
हम सोचते हैं कि कोई घटना होगी, कोई अवसर आएगा, कोई व्यक्ति मिलेगा, कोई परिस्थिति बदलेगी और फिर जीवन ठीक हो जाएगा।
मैं भी शायद उसी इंतज़ार में था।
नीचे आँगन में पुरानी दीवार पर लगी घड़ी बंद पड़ी थी। वर्षों से किसी ने उसे ठीक नहीं कराया था। मैंने नीचे उतरकर उसे देखा। पता नहीं क्यों, उस बंद घड़ी को देखकर मन में एक बात आई, समय कभी बंद नहीं होता, सिर्फ हमारी घड़ी रुक जाती है। हम अक्सर अपने जीवन की किसी एक घटना के साथ अटक जाते हैं।
किसी असफलता के साथ।
किसी पुराने निर्णय के साथ।
किसी नुकसान के साथ।
किसी अधूरे सपने के साथ और फिर वर्षों तक उसी जगह खड़े होकर सोचते रहते हैं कि समय आगे क्यों नहीं बढ़ रहा।
जबकि समय तो लगातार आगे बढ़ रहा होता है। बस हम ही पीछे मुड़कर खड़े हो जाते हैं।
मैं फिर छत पर आ गया। हवा अब भी चल रही थी। दूर खेतों के पार कुछ किसान अपने काम में लगे थे। शायद उन्हें बारिश का इंतज़ार था, लेकिन बारिश आएगी या नहीं—इसकी चिंता किए बिना वे अपनी जमीन तैयार कर रहे थे।
तभी मुझे लगा—
शायद जीवन भी यही सिखाता है। बारिश हमारे हाथ में नहीं है।लेकिन खेत तैयार करना हमारे हाथ में है। अवसर आएगा या नहीं, यह हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन अवसर आने पर हम तैयार होंगे या नहीं—यह हमारे हाथ में है।
लोग हमें समझेंगे या नहीं, यह हमारे हाथ में नहीं है।
लेकिन हम स्वयं को समझने की कोशिश करेंगे या नहीं—यह हमारे हाथ में है।
भविष्य कैसा होगा, यह कोई नहीं जानता।
लेकिन आज हम क्या करेंगे, यह तय करने का अधिकार हमारे पास है। मैंने पहली बार उस दिन क्षितिज को ध्यान से देखा, क्षितिज वास्तव में कोई जगह नहीं थी। वह सिर्फ वह सीमा थी, जहाँ मेरी आँखें जाकर रुक जाती थीं।
उसके आगे भी रास्ता था। बस मुझे दिखाई नहीं दे रहा था शायद जीवन भी ऐसा ही है। हम भविष्य को इसलिए असंभव समझ लेते हैं क्योंकि वह हमें दिखाई नहीं देता। हम भूल जाते हैं कि दिखाई न देना और अस्तित्व में न होना—दो अलग बातें हैं।
उस दिन बारिश आखिरकार नहीं हुई। लेकिन मैं खाली हाथ भी नहीं लौटा। मैंने तय किया कि अब बारिश का इंतज़ार नहीं करूंगा। जो जमीन मेरे पास है, उसे तैयार करूंगा। जो समय मेरे पास है, उसका उपयोग करूंगा। जो गलतियाँ हुई हैं, उनसे सीखूंगा और जो रास्ता अभी दिखाई नहीं दे रहा, उसकी चिंता किए बिना पहला कदम उठाऊंगा। नीचे उतरते समय मैंने उस पुरानी बंद घड़ी को फिर देखा। मैंने उसे दीवार से उतारा। सोचा—इसे ठीक करवाऊंगा।
शायद घड़ी को नहीं। शायद खुद को क्योंकि जीवन में आगे बढ़ने के लिए हमेशा नया रास्ता नहीं चाहिए होता। कभी-कभी सिर्फ रुकी हुई घड़ी को फिर से चलाना पड़ता है और शायद यही जीवन यात्रा का सबसे बड़ा सच है |
क्षितिज के उस पार क्या है, यह जानना जरूरी नहीं। जरूरी यह है कि जिस रास्ते पर आज खड़े हैं, उस पर अगला कदम ईमानदारी से उठा सकें।
बाकी रास्ता...
चलते-चलते दिखाई देने लगता है।

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