बहुत परिश्रम के बाद आखिरकार मैं उस दुर्गम पहाड़ी पर पहुँच ही गया। साँसें तेज चल रही थीं और शरीर थकान से टूट रहा था, लेकिन सामने फैला दृश्य मेरी सारी थकान को धीरे-धीरे अपने भीतर समेट रहा था।
दूर तक फैली पहाड़ियों पर शाम की हल्की सुनहरी रोशनी बिखरी हुई थी। कहीं-कहीं बादलों के टुकड़े पहाड़ों को छूते हुए गुजर रहे थे। नीचे घाटी में छोटे-छोटे घर किसी खिलौने की तरह दिखाई दे रहे थे। हवा में मिट्टी, घास और जंगली फूलों की मिली-जुली खुशबू थी।
मैंने एक बड़े पत्थर पर बैठकर चारों ओर देखा। कुछ दूरी पर गायें और बकरियाँ घास चर रही थीं। पहाड़ी पर खड़े पुराने पेड़ हवा के साथ धीरे-धीरे झूम रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति स्वयं किसी अनसुने संगीत पर नृत्य कर रही हो।
मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा।
सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे उतरने लगा। आकाश पहले सुनहरा हुआ, फिर नारंगी और आखिर में लाल। मैं उस बदलते रंग को तब तक देखता रहा, जब तक सूर्य की अंतिम लालिमा भी क्षितिज से गायब नहीं हो गई।
“चलो, अब आगे बढ़ना चाहिए।”
पीछे से आवाज आई।
मैंने मुड़कर देखा। मेरा साथी मुस्कुराते हुए खड़ा था।
“थक गए?” उसने पूछा।
मैंने हँसकर कहा, “थकान तो है, लेकिन यहाँ बैठकर लगता है कि सारी जिंदगी यहीं गुजार दूँ।”
वह कुछ नहीं बोला। बस मेरे पास आकर बैठ गया।
कुछ क्षण तक हम दोनों चुप रहे।
शहर में शायद यह चुप्पी असहज लगती, लेकिन उस पहाड़ी पर हमारी खामोशी भी जैसे बातचीत कर रही थी। दूर कहीं किसी पक्षी की आवाज सुनाई दी। फिर हवा चली और पेड़ों की पत्तियाँ सरसराने लगीं।
अचानक उसने कहा, “तुमने कभी सोचा है, हम शहर में आखिर इतना भागते क्यों हैं?”
मैंने उसकी तरफ देखा।
वह सामने अँधेरे में डूबती पहाड़ियों को देख रहा था।
“शायद किसी ऐसी चीज के पीछे,” मैंने कहा, “जो हमारे पास पहुँचते-पहुँचते अपना मतलब खो देती है।”
वह मुस्कुराया।
“और यहाँ?”
मैंने गहरी साँस ली।
“यहाँ लगता है कि कुछ भी पाने की जरूरत नहीं है।”
अँधेरा अब पूरी तरह उतर चुका था। हमने अपने बैग से सूखी लकड़ियाँ निकालीं और थोड़ी देर बाद हमारे सामने एक छोटा-सा अलाव जल रहा था।
आग की रोशनी में हमारे चेहरे चमक रहे थे और चारों ओर घना अँधेरा था। ऊपर आसमान में असंख्य तारे दिखाई दे रहे थे। शहर में रहने के कारण मैं भूल ही गया था कि आकाश इतना बड़ा भी हो सकता है।
हम दोनों आग के पास बैठे रहे।
कभी किसी पुरानी बात पर हँसते, कभी चुप हो जाते।
रात गहराती गई।
कुछ देर बाद मेरे साथी ने धीमी आवाज में कहा, “जानते हो, जिंदगी में कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहाँ हम घूमने नहीं जाते... वे जगहें हमें अपने पास बुलाती हैं।”
मैंने उसकी ओर देखा, लेकिन वह आँखें बंद करके आग की गर्मी महसूस कर रहा था।
उस रात हमने किसी होटल का आराम नहीं माँगा। न कोई मोबाइल नेटवर्क था, न शहर का शोर, न समय की चिंता।
सिर्फ पहाड़ थे।
पेड़ों की सरसराहट थी।
जलती हुई लकड़ियों की आवाज थी।
और हमारे बीच एक लंबी, शांत रात थी।
पहली बार मुझे लगा कि सुकून कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। वह तो हमारे आसपास हमेशा मौजूद रहता है, बस उसे महसूस करने के लिए हमें अपने भीतर का शोर थोड़ा शांत करना पड़ता है।
सुबह जब मेरी आँख खुली तो सूरज की पहली किरणें पहाड़ की चोटी पर पड़ रही थीं। रात की ठंडक अभी हवा में बाकी थी। सामने घाटी पर हल्का कोहरा तैर रहा था।
मेरा साथी चाय बना रहा था।
उसने मेरी तरफ कप बढ़ाते हुए कहा, “चलें?”
मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर उस जगह को देखा।
अलाव की राख अभी भी गर्म थी।
पेड़ वैसे ही खड़े थे।
पहाड़ वैसे ही शांत थे।
लेकिन मैं वैसा नहीं था।
शहर लौटते समय मेरे साथ सिर्फ मेरा बैग नहीं था। उस पहाड़ की रात भी मेरे साथ चल रही थी—एक ऐसी रात, जिसने मुझे सिखाया था कि जिंदगी की सबसे खूबसूरत यात्राएँ हमेशा किसी मंजिल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं।
कुछ यात्राएँ हमें हमसे ही मिलाने के लिए होती हैं।
(धीरेन्द्र सिंह)
