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Wednesday, August 12, 2026

पहाड़ की वह रात

 

बहुत परिश्रम के बाद आखिरकार मैं उस दुर्गम पहाड़ी पर पहुँच ही गया। साँसें तेज चल रही थीं और शरीर थकान से टूट रहा था, लेकिन सामने फैला दृश्य मेरी सारी थकान को धीरे-धीरे अपने भीतर समेट रहा था।

दूर तक फैली पहाड़ियों पर शाम की हल्की सुनहरी रोशनी बिखरी हुई थी। कहीं-कहीं बादलों के टुकड़े पहाड़ों को छूते हुए गुजर रहे थे। नीचे घाटी में छोटे-छोटे घर किसी खिलौने की तरह दिखाई दे रहे थे। हवा में मिट्टी, घास और जंगली फूलों की मिली-जुली खुशबू थी।

मैंने एक बड़े पत्थर पर बैठकर चारों ओर देखा। कुछ दूरी पर गायें और बकरियाँ घास चर रही थीं। पहाड़ी पर खड़े पुराने पेड़ हवा के साथ धीरे-धीरे झूम रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे प्रकृति स्वयं किसी अनसुने संगीत पर नृत्य कर रही हो।

मैं कुछ देर वहीं बैठा रहा।

सूरज धीरे-धीरे पहाड़ों के पीछे उतरने लगा। आकाश पहले सुनहरा हुआ, फिर नारंगी और आखिर में लाल। मैं उस बदलते रंग को तब तक देखता रहा, जब तक सूर्य की अंतिम लालिमा भी क्षितिज से गायब नहीं हो गई।

“चलो, अब आगे बढ़ना चाहिए।”

पीछे से आवाज आई।

मैंने मुड़कर देखा। मेरा साथी मुस्कुराते हुए खड़ा था।

“थक गए?” उसने पूछा।

मैंने हँसकर कहा, “थकान तो है, लेकिन यहाँ बैठकर लगता है कि सारी जिंदगी यहीं गुजार दूँ।”

वह कुछ नहीं बोला। बस मेरे पास आकर बैठ गया।

कुछ क्षण तक हम दोनों चुप रहे।

शहर में शायद यह चुप्पी असहज लगती, लेकिन उस पहाड़ी पर हमारी खामोशी भी जैसे बातचीत कर रही थी। दूर कहीं किसी पक्षी की आवाज सुनाई दी। फिर हवा चली और पेड़ों की पत्तियाँ सरसराने लगीं।

अचानक उसने कहा, “तुमने कभी सोचा है, हम शहर में आखिर इतना भागते क्यों हैं?”

मैंने उसकी तरफ देखा।

वह सामने अँधेरे में डूबती पहाड़ियों को देख रहा था।

“शायद किसी ऐसी चीज के पीछे,” मैंने कहा, “जो हमारे पास पहुँचते-पहुँचते अपना मतलब खो देती है।”

वह मुस्कुराया।

“और यहाँ?”

मैंने गहरी साँस ली।

“यहाँ लगता है कि कुछ भी पाने की जरूरत नहीं है।”

अँधेरा अब पूरी तरह उतर चुका था। हमने अपने बैग से सूखी लकड़ियाँ निकालीं और थोड़ी देर बाद हमारे सामने एक छोटा-सा अलाव जल रहा था।

आग की रोशनी में हमारे चेहरे चमक रहे थे और चारों ओर घना अँधेरा था। ऊपर आसमान में असंख्य तारे दिखाई दे रहे थे। शहर में रहने के कारण मैं भूल ही गया था कि आकाश इतना बड़ा भी हो सकता है।

हम दोनों आग के पास बैठे रहे।

कभी किसी पुरानी बात पर हँसते, कभी चुप हो जाते।

रात गहराती गई।

कुछ देर बाद मेरे साथी ने धीमी आवाज में कहा, “जानते हो, जिंदगी में कुछ जगहें ऐसी होती हैं जहाँ हम घूमने नहीं जाते... वे जगहें हमें अपने पास बुलाती हैं।”

मैंने उसकी ओर देखा, लेकिन वह आँखें बंद करके आग की गर्मी महसूस कर रहा था।

उस रात हमने किसी होटल का आराम नहीं माँगा। न कोई मोबाइल नेटवर्क था, न शहर का शोर, न समय की चिंता।

सिर्फ पहाड़ थे।

पेड़ों की सरसराहट थी।

जलती हुई लकड़ियों की आवाज थी।

और हमारे बीच एक लंबी, शांत रात थी।

पहली बार मुझे लगा कि सुकून कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है। वह तो हमारे आसपास हमेशा मौजूद रहता है, बस उसे महसूस करने के लिए हमें अपने भीतर का शोर थोड़ा शांत करना पड़ता है।

सुबह जब मेरी आँख खुली तो सूरज की पहली किरणें पहाड़ की चोटी पर पड़ रही थीं। रात की ठंडक अभी हवा में बाकी थी। सामने घाटी पर हल्का कोहरा तैर रहा था।

मेरा साथी चाय बना रहा था।

उसने मेरी तरफ कप बढ़ाते हुए कहा, “चलें?”

मैंने एक बार फिर पीछे मुड़कर उस जगह को देखा।

अलाव की राख अभी भी गर्म थी।

पेड़ वैसे ही खड़े थे।

पहाड़ वैसे ही शांत थे।

लेकिन मैं वैसा नहीं था।

शहर लौटते समय मेरे साथ सिर्फ मेरा बैग नहीं था। उस पहाड़ की रात भी मेरे साथ चल रही थी—एक ऐसी रात, जिसने मुझे सिखाया था कि जिंदगी की सबसे खूबसूरत यात्राएँ हमेशा किसी मंजिल तक पहुँचने के लिए नहीं होतीं।

कुछ यात्राएँ हमें हमसे ही मिलाने के लिए होती हैं।


                                           (धीरेन्द्र सिंह)

Sunday, December 14, 2025

स्थिरता और जुनून के बीच का संघर्ष | The struggle between stability and passion

 

स्थिरता और जुनून के बीच का संघर्ष | The struggle between stability and passion


जब हम छोटे होते हैं, तब हर व्यक्ति हमसे पूछता रहता है — “बेटा, बड़े होकर क्या बनोगे?”

तब लोग हमसे हमारे सपनों के बारे में जानना चाहते हैं, और हम भी उत्साह से उन्हें बताते हैं कि हम क्या बनना चाहते हैं।

फिर एक दिन हम बड़े हो जाते हैं।
नौकरी, जीवनसाथी, बच्चे और घर की ज़िम्मेदारियाँ—सब एक-एक करके साथ आती जाती हैं।
लेकिन इनके बीच अगर कुछ खो जाता है, तो वह है हमारा सपना और उसे पूरा करने का हमारा जुनून

आज जीवन स्थिर है, सुंदर है, खुशहाल है—और क्या चाहिए ज़िंदगी में?
बाहर से सब ठीक लगता है, पर भीतर कुछ ऐसा है जो बेचैन करता रहता है।
एक प्रश्न, जो बार-बार ज़हन में आता है — “जो सपना था, क्या वह पूरा हो गया?”

ज़िंदगी बहुत तेज़ी से बीत रही है, पर ज़िम्मेदारियाँ उस पर सोचने का वक्त नहीं देतीं।
ऐसे ही दिन, महीने और साल बीत जाते हैं, और वह सवाल जस का तस बना रहता है।

यह स्थिरता हमें क्या देती है?
यह हमें और हमारे परिवार को सुरक्षा का भाव देती है।
परिवार को खुशियाँ देती है — जो जीवन का प्रथम लक्ष्य भी होता है।
किन्तु यही स्थिरता हमारे जुनून पर अंकुश भी लगा देती है।
अब हम बेफिक्री से खतरे नहीं उठा सकते, और वह सपना, वह जुनून धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है।

जुनून का सच?

जुनून आकर्षक नहीं होता।
इसमें सब कुछ साफ-साफ पता नहीं होता।
जो सपना देखा था, उससे कमाई होगी या नहीं — इसका भी अंदाज़ा नहीं होता।
ख़ुद पर भी संदेह होता है।

लेकिन जुनून में पागलपन होता है, नशा होता है, सच्ची खुशी होती है,
और एक अजीब-सा सुकून होता है, जो हमारे विचारों को दृढ़ रखता है।

हर दिन यह जंग वह हर व्यक्ति अपने आप से लड़ता है, जिसने कोई सपना देखा है, पर उसे टालता चला जा रहा है — कभी ज़िम्मेदारियों की वजह से, कभी किसी और वजह से।

फिर शुरू होता है ख़ुद से नफ़रत करने का, दूसरों से अपनी तुलना करने का सिलसिला, और यहीं से जन्म लेता है अवसाद — depression

जबकि वास्तव में स्थिरता और जुनून के बीच कोई युद्ध नहीं है।
असली समस्या की जड़ है — समझ की कमी, नज़रिये की कमी, और अपने सपने पर विश्वास की कमी।

हम स्थिरता को अपना दुश्मन समझते हैं, जबकि यदि हम उसे एक सहायक के रूप में स्वीकार करें, तो वही स्थिरता हमें वह सपना जीने का अवसर दे सकती है, जो हमने देखा था।

यदि आपका सपना सच्चा है, तो आप उसे पाने के लिए एक अच्छी रणनीति बनाएँगे, स्थिरता का उपयोग उसके लिए करेंगे,
और पूरे जुनून के साथ आगे बढ़ेंगे।

अपने आप से कुछ सवाल ज़रूर पूछिए —

  1. मैं वास्तव में क्या करना चाहता हूँ?

  2. क्या मेरा सपना मेरी ज़िंदगी का हिस्सा है?

  3. उसे पाने के लिए मैं क्या दाँव पर लगा सकता हूँ?

हम सब ज़िंदगी की दौड़ में बस थक गए हैं और थोड़े-से उलझ गए हैं। अपने आप को थोड़ा समय दीजिए।

पूरी निष्ठा के साथ अपने लक्ष्य का चुनाव कीजिए, उसके लिए सबसे अच्छी रणनीति बनाइए और फिर पूरे मन से उसमें खुद को झोंक दीजिए।

— धीरेन्द्र सिंह


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Monday, December 8, 2025

प्रेम की सुंदरता: जहाँ पीड़ा में भी आनंद है | The Beautiful pain of love

प्रेम की सुंदरता: जहाँ पीड़ा में भी आनंद है | The Beautiful pain of love


तुम मुझसे रूठ जाओ, तो कोई बात नहीं,

पर तुम्हें मनाने का हक मुझसे मत छीनना।


तुम दूर सही, पर अगर खुश हो,

बस यही बात मंज़ूर है मुझको।


तेरी याद सताती है, पर कहने की हिम्मत नहीं होती,

तेरी तस्वीर देखकर यादों में ही खोजना पड़ता है तुझको।


यह तो मैं और तुम हैं…

कौन कल्पना कर सकता है इस विरह-पीड़ा की,

राधा–कृष्ण के प्रेम की।


कौन जाने पीड़ा मीरा बाई की,

कौन जाने पीड़ा मेरे कृष्ण की।

प्रेम की यही तो सुंदरता है

जिसमें पीड़ा में भी आनंद है, तड़प है,

मिलने की आस है।


तुम मुझसे रूठ जाओ, तो भी कोई बात नहीं,

पर तुम्हें मनाने का हक मुझसे मत छीनना।           

               

                                            (धीरेन्द्र सिंह)



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